Saturday, August 18, 2007
Friday, August 17, 2007
कागज़ी घोड़े दौड़ाओ
मन हमारा पुराना पापी है, लेकिन इन्सान अच्छा हूँ। कुछ दोस्ती करने कुछ भूला बिसरा याद करने आया हुँ , बस इतना फसाना है । इस महाजाल का पुराना रसिया हुँ, अभी तक सिर्फ घूमता फिरता ही रहा यहाँ पर, अब ठिकाना बनाया है।अब कुछ खिड़कीयाँ कुछ दरवाज़े कुछ रंग रोग़न कराना है, पहला टिकाना जो है इस महाजाल पे ।हिन्दी लिखनी तो नही आती लेकिन भाती ज़रूर है, यहाँ तो महारथीयों का मेला है बस पिछली.................. लाईन मे मै भी शायद हुँ ,लिखना तो आता नही कागज़ी घोड़े दौड़ाने आते है जो दौड़ा रहा हुँ। गलती के लिए क्षमा, कुछ अच्छा लगे तो समर्थन दरकार है।
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